शिक्षा का उद्देश्य । Shiksha Ka Uddeshya


शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य क्या है इस संबंध में विभिन्न सम्प्रदायों, चिंतन धाराओं, विचारकों, शिक्षाशास्त्रियों और दार्शनिकों के द्वारा शिक्षा के विविध उद्देश्य बताए गए हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं-


(1) पाश्चात्य दार्शनिक सम्प्रदाय


(i) प्रकृतिवाद में शिक्षा के उद्देश्य 


प्रकृतिवादी विचार धारा के अनुसार विद्वानों ने निम्नलिखित  उद्देश्य बतायें हैं:-


(१) आत्माभिव्यक्ति - प्रकृतिवाद में शिक्षा  के कई उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं, उन सभी का निचोड़ आत्माभिव्यक्ति और आत्म (स्व) संरक्षण है। स्पेन्सर ने कहा है अपना अस्तित्व लगातार बनाए रखने के लिए आत्माभिव्यक्ति और आत्म संरक्षण आवश्यक है। 


(२) व्यक्ति को संघर्षशील जीवन के लिए तैयार करना - शिक्षा का प्रमुख काम यह है कि वह मनुष्य को अधिक से अधिक सक्षम बनाए जिससे वह अपने भावी जीवन की  कठिनाइयों और समस्याओं  को कुशलता से समाप्त कर सके। डार्विन ने 'प्राकृतिक चयन' का सिद्धान्त दिया और इसकी पुष्टि एक सहायक सिद्धांत 'अस्तित्व के लिए संघर्ष' से किया, जिसका मतलब है अपने अस्तित्व के लिए जीवों का परस्पर संघर्ष। यह मनुष्य पर भी लागू होता है इसको भी अपने अस्तित्व के लिए वातावरण से निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की उन शक्तियों का विकास करना है जो उसे संघर्षशील जीवन के लिए तैयार कर सके।


(३) परिस्थितियों का अनुकूलन करने योग्य बनाना - प्रत्येक व्यक्ति को अनुकूल/प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। कई प्रतिकूल परिस्थितियों से व्यक्ति हताश हो जाता है, इसलिए व्यक्ति में परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति होनी चाहिए। इसलिए लैमार्क ने कहा है- "शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने की क्षमता प्रदान करना है जिससे वह या तो स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार ढाल सके या परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना सके "


(४) प्राकृतिक विकास - प्रकृतिवाद के अनुसार  बालक को सेहतमंद और बलशाली बनाने के लिए उसकी शारीरिक शक्तियों तथा व्यक्तिगत अंतर को ध्यान में रखते हुए उसकी प्राकृतिक प्रवृत्तियों को स्वतंत्र रूप से विकसित करे।




(५) सभ्यता एवं संस्कृति का विकास  - जार्ज बर्नाड शॉ के अनुसार, 'शिक्षा का उद्देश्य सभ्यता एवं संस्कृति का विकास भी है।" उन्होंने कहा है कि मानव एक सर्वश्रेष्ठ प्राणी है तथा पशु एक असभ्य प्राणी है। इन दोनों में सभ्यता का अन्तर है, इसलिए शिक्षा का उद्देश्य मानव को सभ्य बनाना व परम्परागत संस्कृति का ज्ञान कराना है जिससे वह अपने देश की संस्कृति का संरक्षण कर विकसित करे।


(६) वर्तमान और आगामी प्रसन्नता/सुख की प्राप्ति  - शिक्षा का लक्ष्य वयक्ति की वर्तमान और आगामी प्रसन्नता व सुख को प्राप्त करना है।


(७) व्यक्तित्व का स्वतंत्र विकास - शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व स्वतंत्र रूप से विकसित हो सके। 


(८) मानव की मूल प्रवृत्तियों का निर्देशन - मानव की मूल प्रवृत्तियों को मैकडुगल ने उसके चरित्र का मजबूत आधार बताया है। इसलिए इन प्रवृत्तियों का निर्देशन तथा उदात्तीकरण ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। यह प्राकृतिक तथा सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होगा।


(९) खाली समय का सही उपयोग करना - प्रकृतिवादी दर्शन में खाली समय के सही उपयोग पर भी बल दिया जाता है। विशेषकर बालक का खाली समय ऐसी कार्यों में बितना चाहिए जो उसके रुचि के अनुकूल हो और उसे  विकास का मौका प्रदान करे, जो उसे उच्च जीवन स्तर की ओर प्रवृत्त करे। प्रकृतिवादियों ने भिन्न-भिन्न शैक्षिक उद्देश्य बताए हैं। इनके द्वारा भौतिक पक्ष को प्रमुखता प्रदान की गई है, जबकि बौद्धिक एवं चारित्रिक विकास भी अत्यंत आवश्यक है।


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(ii) आदर्शवाद में शिक्षा के उद्देश्य


आदर्शवाद में आदर्शवादी विद्वानों के अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं:


(१) आत्म की अनुभूति या आत्मबोध - आदर्शवादियों के अनुसार आत्म की अनुभूति  शिक्षा का उद्देश्य है, जिसका मतलब है स्वयं को समझना। सुकरात  का कथन है, "स्वयं को जानो"। प्रत्येक बालक में दैवीय गुण होते हैं। इन दैवीय गुणों का विकसित कर वह आदर्श स्थिति को प्राप्त कर सकता है। इन गुणों को जानना ही आत्मज्ञान है। जेन्टाईल के अनुसार "आत्मानुभूति ही शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य है और शिक्षा का उद्देश्य है।"


(२) व्यक्तित्व का विकास - आदर्शवादियों का मानना है कि मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है। इसलिए मनुष्य की प्रगति ही शिक्षा का उद्देश्य है। प्लेटो "शिक्षा का उद्देश्य आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण तथा विकास करना है।"

"शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होना चाहिए, जिससे मनुष्य अपनी क्षमताओं के अनुसार मानव जीवन को कुछ मौलिक योगदान दे सके।" - टी.पी. नन।

"आदर्शवाद से विशेष रूप से सम्बन्धित शिक्षा का उद्देश्य है-व्यक्तित्व का उत्कर्ष।" - रॉस ।


(३) आध्यात्मिक मूल्यों की अनुभूति और विकास - आदर्शवादियों ने आध्यात्मिक उन्नति करने को मानव जीवन का लक्ष्य  बताया है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए उन चिरस्थायी मूल्यों जैसे, सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की प्राप्ति को आवश्यक समझा है। इसलिए शिक्षा इस तरह से दी जाए कि प्रत्येक बालक इन मूल्यों की अनुभूति कर सके। रस्क के अनुसार "शिक्षा को मनुष्य को उसकी संस्कृति के द्वारा अधिक और पूर्ण रूप से आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रविष्ट होने योग्य बनाना चाहिए।" 


(४) सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण एवं विकास - मनुष्य बुद्धिजीवी होता है। उसने रचनात्मकता द्वारा सांस्कृतिक ढाँचें को तैयार किया है। मनुष्य की संस्कृति उसकी पैतृक धरोहर है तथा उसका संरक्षण व विकास करना तथा उसको नई पीढ़ी तक पहुंचाना उसका  परम् कर्तव्य है। ये कार्य शिक्षा की सहायता से ही हो सकता है। 

रॉस के अनुसार, "धर्म, नैतिकता, कला, साहित्य, गणित, विज्ञान, विभिन्न गुणों में किये जाने वाले मनुष्य के नैतिक, मानसिक तथा सौन्दर्यात्मक कार्यों का परिणाम है।"


(5) आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति-

शिक्षा का उद्देश्य

आदर्शवादियों के अनुसार सत्यम्, सुन्दरम् एवं शिवम् आध्यात्मिक मूल्य हैं। ये मूल्य चिरस्थायी हैं, शाश्वत हैं, सत्य हैं। इसको मनुष्य ने नहीं बनाया है बल्कि ये पूर्व निर्धारित हैं। मनुष्य को ये मूल्य धरोहर के रूप में मिले हैं। शिक्षा का उद्देश्य बालक को इन आध्यात्मिक मूल्यों की अनुभूति करा कर आध्यात्मिक विकास करना है। इस बारे में हॉर्न का कहना है, "आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति होने पर मनुष्य पूर्णता को प्राप्त करता है। अतः बालक की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो इन आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति में सहायक हो।"


(६) पावन जीवन की प्राप्ति - आदर्शवादी भौतिक सुखों को मिथ्या मानते हैं। वे आत्मा के विकास और आध्यात्मिक मूल्यों की अनुभूति पर जोर देते हैं और इसके लिए व्यक्ति के जीवन का पावन होना अति आवश्यक मानते हैं। उनका मत है कि शिक्षा के द्वारा बालक में अच्छे व बुरे में, उचित व अनुचित में, वांछनीय व अवांछनीय में अन्तर कर पाने की क्षमता विकसित    की  जानी   चाहिए तभी   वह आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर सकेगा। 

इसलिए आदर्शवादियों के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य पावन जीवन की प्राप्ति होना चाहिए। फ्रोबेल के अनुसार "भक्तिपूर्ण, पवित्र तथा कलंक रहित जीवन की प्राप्ति। शिक्षा को मनुष्य का पथ-प्रदर्शन इस प्रकार करना चाहिए कि उसे अपने आप का, प्रकृति का सामना करने का और ईश्वर से एकता स्थापित करने को स्पष्ट ज्ञान हो।" 


(७) सार्वभौमिक शिक्षा - मानव जाति एक है आदर्शवाद समस्त विश्व को एक परिवार मानता है अतः शिक्षा सार्वभौमिक होनी चाहिए। यह शाश्वत सत्य पर आधारित होनी चाहिए। विश्व को एक चिन्तन प्रक्रिया समझा जाता है। यह विवेक से सम्पन्न एक व्यवस्थित इकाई है। हमें इस विश्व को चलाने के लिए शाश्वत मूल्यों का ज्ञान प्राप्त होना चाहिए।


(८) पूर्ण मनुष्य का विकास - बच्चे का पूर्ण मनुष्य में विकास करना आदर्शवादी शिक्षा का उद्देश्य है जिसमें शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक, संवेगात्मक तथा सांस्कृतिक पक्ष सम्मिलित हैं। 


(९) सादा जीवन तथा ऊँच विचार - आदर्शवादियों के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य सादा जीवन तथा ऊँच विचार होना चाहिए।


(१०) शिक्षा का तात्कालिक तथा अन्तिम उद्देश्य - हार्न  ने दो प्रकार के उद्देश्यों को प्रतिपादित किया है: 

(क) तात्कालिक उद्देश्य - इसके अंतर्गत स्वास्थ्य, बुद्धि, कुशलता, कला, सामाजिक न्याय तथा आचरण विकास को रखा है।


(ख) अन्तिम उद्देश्य -  इसके अंतर्गत दिव्यता के प्रतिबिम्ब में मानवता का विकास को रखा है।


देखेें...


(iii) प्रयोजनवाद में शिक्षा के उद्देश्य


प्रयोजनवादी शिक्षा के किसी पूर्व निर्धारित उद्देश्यों को नहीं मानते। उनके अनुसार शिक्षा के उद्देश्य का निर्धारण बालक के अनुभवों के आधार पर  होना चाहिए।