रुचि का विकास और पसंद की भूमिका


अनुक्रमिक ज्ञान अर्जन के दौरान रुचि (interest) का विकास और पसंद की भूमिका


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विद्यालय के वातावरण में सीखने के लिए रुचि एक महत्वपूर्ण प्रेरक तत्व है। किन्तु, कुछ ही अनुसंधान से सीधे पता चलता है कि जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है या संग्रह होता है, कुछ समय बाद रुचियों में बदलाव होता है। एक बेहतर बोध हासिल करने के लिए कि कैसे ज्ञान का अधिग्रहण किसी के रुचियों को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करता है। ग्रोथ-कर्व मॉडलिंग से पता चलता है कि रुचि ज्ञान अर्जन के दौरान बढ़ती है जब तक कि अंततः इसकी उन्नति रुक जाय और घटने लगे।

यह भी पाया गया है कि जानकारी चुनने के अवसर देने पर भी रुचियों में वृद्धि को बल मिला और देर होने पर इसका पतन हुआ अथवा कमी आयी। आगे के विश्लेषण से पता चला कि जब लोगों के रूचियों में कमी आने लगी, वे किसी विषय विशेष के बारे में जानकारी प्राप्त करने से विमुख होने लगे।


रुचि हमारे रोजमर्रा के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण प्रेरक और भावात्मक कार्यप्रणाली में से एक के रूप में कार्य करता है। किसी भी बाहरी प्रोत्साहन के अभाव में रुचि को एक विशिष्ट गतिविधि में संलग्न होने के लिए एक संज्ञानात्मक, भावात्मक एवं सकारात्मक इच्छा के रूप में विचार किया जा सकता है,और अध्ययन बताते हैं कि रुचि विभिन्न परिणामों को बढ़ाता है जैसे कि कार्य प्रदर्शन, जीवन गुणवत्ता और शारीरिक स्वास्थ्य इत्यादि। शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में कई प्रयोगसिद्ध अध्ययन विभिन्न अधिगम (सीखने ) परिणामों पर रुचि के लाभकारी प्रभावों को जैसे कि छात्र संलिप्तता, और पाठ्यक्रम चयन आदि को प्रकट करते हैं।


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रुचि का विकास

अन्य प्रेरक और भावनात्मक धारणाओं की तुलना में, रुचि की उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक यह है कि यह समय के साथ विकसित होता है। एक छात्र को किसी विशिष्ट विषय या वस्तु में अचानक दिलचस्पी नहीं हो सकती; छात्र को इसमें रुचि कैसे हुई, इसका एक अनुसरण पथ होना चाहिए। इस प्रकार, मानवीय रुचि के बारे में एक व्यापक तस्वीर प्रदान करने के लिए, अंतर-स्थैतिक विकास के अंतर्निहित तंत्र को समझना आवश्यक है। ऐसे कई सिद्धांत हैं जो रुचि के विभिन्न घटकों और संभावित विकास के बारे में बताते हैं। सबसे प्रभावशाली मॉडल में से एक हिडी और रेनिंगर द्वारा प्रस्तावित रुचि विकास का चार-चरण (४-फेज) मॉडल है। यह मॉडल रुचि के दो अलग-अलग-प्रकारों को प्रस्तुत करता है-स्थितिजन्य रुचि और व्यक्तिगत रुचि।


स्थितिजन्य रुचि ऐसे रुचियों को संदर्भित करती है जो स्थितिजन्य कारकों के जवाब में उत्पन्न होती हैं, जबकि व्यक्तिगत रुचि उस रुचि को संदर्भित करती है जो व्यक्ति के भीतर टिकी हुई है और रुचि के विषय के साथ फिर से संलिप्तता की तलाश करने देती है। स्थितिजन्य रुचि किसी कार्य और किसी व्यक्ति के लिए विशेष है, और इसे सामान्य रूप से किसी विषय के प्रति बढ़े हुए ध्यान से, इसके बारे में अधिक जानने की इच्छा, और उसके प्रति सकारात्मक भाव से चिन्हित किया जाता है। महत्वपूर्ण रूप से, किसी विशिष्ट विषय के लिए स्थितिजन्य रुचि के बार-बार संपर्क में आने से अधिक समय तक स्थितिजन्य रुचि हो सकता है, जब तक कि व्यक्ति को स्थितिजन्य ट्रिगर की आवश्यकता के बिना उस विषय के बारे में सक्रिय रूप से जानकारी नहीं मिल जाती है, और रुचि के विकास के इस चरण को व्यक्तिगत रुचि कहा जाता है।


स्कूल के विषयों में व्यक्तिगत रुचि के अनुदैर्ध्य विकास को अच्छी तरह से प्रलेखित किया गया है, बहुत कम स्थितिजन्य रुचि के विकास के बारे में जाना जाता है, उदाहरण के लिए, जब एक किताब पढ़ते हैं या कक्षा में भाग लेते हैं। वास्तव में, जबकि पिछले अध्ययनों ने कई महत्वपूर्ण कारकों की पहचान की है जो स्थितिजन्य रुचि को ट्रिगर करते हैं जैसे कि जीवंतता, नवीनता और कार्य कठिनाई, समय के साथ स्थितिजन्य रुचि के विकास की जांच करने वाले कार्य अनुभव में काफी कम है; वास्तव में यह बताया गया है कि यह एक ऐसा विषय है जिसे खराब समझा जाता है। विभिन्न कारणों में से एक यह है कि शोधकर्ताओं ने स्थितिगत रुचि को चर और अस्थिर के रूप में माना, कई क्षणिक कारकों से प्रभावित होने के कारण जैसे कि एक व्यवस्थित विकास प्रक्षेपवक्र खींचना मुश्किल है।


हालांकि कुछ निष्कर्ष हतोत्साहित करने वाले भी रहे हैं, स्थितिजन्य रुचि के विकास के संबंध में इन निष्कर्षों की व्याख्या  रुचि के तीन मामलों में मुश्किल है।