शिक्षा का उद्देश्य । Shiksha Ka Uddeshya


शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य क्या है इस संबंध में विभिन्न सम्प्रदायों, चिंतन धाराओं, विचारकों, शिक्षाशास्त्रियों और दार्शनिकों के द्वारा शिक्षा के विविध उद्देश्य बताए गए हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं-


(1) पाश्चात्य दार्शनिक सम्प्रदाय


(i) प्रकृतिवाद में शिक्षा के उद्देश्य 


प्रकृतिवादी विचार धारा के अनुसार विद्वानों ने निम्नलिखित  उद्देश्य बतायें हैं:-


(१) आत्माभिव्यक्ति - प्रकृतिवाद में शिक्षा  के कई उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं, उन सभी का निचोड़ आत्माभिव्यक्ति और आत्म (स्व) संरक्षण है। स्पेन्सर ने कहा है अपना अस्तित्व लगातार बनाए रखने के लिए आत्माभिव्यक्ति और आत्म संरक्षण आवश्यक है। 


(२) व्यक्ति को संघर्षशील जीवन के लिए तैयार करना - शिक्षा का प्रमुख काम यह है कि वह मनुष्य को अधिक से अधिक सक्षम बनाए जिससे वह अपने भावी जीवन की  कठिनाइयों और समस्याओं  को कुशलता से समाप्त कर सके। डार्विन ने 'प्राकृतिक चयन' का सिद्धान्त दिया और इसकी पुष्टि एक सहायक सिद्धांत 'अस्तित्व के लिए संघर्ष' से किया, जिसका मतलब है अपने अस्तित्व के लिए जीवों का परस्पर संघर्ष। यह मनुष्य पर भी लागू होता है इसको भी अपने अस्तित्व के लिए वातावरण से निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की उन शक्तियों का विकास करना है जो उसे संघर्षशील जीवन के लिए तैयार कर सके।


(३) परिस्थितियों का अनुकूलन करने योग्य बनाना - प्रत्येक व्यक्ति को अनुकूल/प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। कई प्रतिकूल परिस्थितियों से व्यक्ति हताश हो जाता है, इसलिए व्यक्ति में परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति होनी चाहिए। इसलिए लैमार्क ने कहा है- "शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने की क्षमता प्रदान करना है जिससे वह या तो स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार ढाल सके या परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना सके "


(४) प्राकृतिक विकास - प्रकृतिवाद के अनुसार  बालक को सेहतमंद और बलशाली बनाने के लिए उसकी शारीरिक शक्तियों तथा व्यक्तिगत अंतर को ध्यान में रखते हुए उसकी प्राकृतिक प्रवृत्तियों को स्वतंत्र रूप से विकसित करे।




(५) सभ्यता एवं संस्कृति का विकास  - जार्ज बर्नाड शॉ के अनुसार, 'शिक्षा का उद्देश्य सभ्यता एवं संस्कृति का विकास भी है।" उन्होंने कहा है कि मानव एक सर्वश्रेष्ठ प्राणी है तथा पशु एक असभ्य प्राणी है। इन दोनों में सभ्यता का अन्तर है, इसलिए शिक्षा का उद्देश्य मानव को सभ्य बनाना व परम्परागत संस्कृति का ज्ञान कराना है जिससे वह अपने देश की संस्कृति का संरक्षण कर विकसित करे।


(६) वर्तमान और आगामी प्रसन्नता/सुख की प्राप्ति  - शिक्षा का लक्ष्य वयक्ति की वर्तमान और आगामी प्रसन्नता व सुख को प्राप्त करना है।


(७) व्यक्तित्व का स्वतंत्र विकास - शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व स्वतंत्र रूप से विकसित हो सके। 


(८) मानव की मूल प्रवृत्तियों का निर्देशन - मानव की मूल प्रवृत्तियों को मैकडुगल ने उसके चरित्र का मजबूत आधार बताया है। इसलिए इन प्रवृत्तियों का निर्देशन तथा उदात्तीकरण ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। यह प्राकृतिक तथा सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होगा।


(९) खाली समय का सही उपयोग करना - प्रकृतिवादी दर्शन में खाली समय के सही उपयोग पर भी बल दिया जाता है। विशेषकर बालक का खाली समय ऐसी कार्यों में बितना चाहिए जो उसके रुचि के अनुकूल हो और उसे  विकास का मौका प्रदान करे, जो उसे उच्च जीवन स्तर की ओर प्रवृत्त करे। प्रकृतिवादियों ने भिन्न-भिन्न शैक्षिक उद्देश्य बताए हैं। इनके द्वारा भौतिक पक्ष को प्रमुखता प्रदान की गई है, जबकि बौद्धिक एवं चारित्रिक विकास भी अत्यंत आवश्यक है।


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(ii) आदर्शवाद में शिक्षा के उद्देश्य


आदर्शवाद में आदर्शवादी विद्वानों के अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं:


(१) आत्म की अनुभूति या आत्मबोध - आदर्शवादियों के अनुसार आत्म की अनुभूति  शिक्षा का उद्देश्य है, जिसका मतलब है स्वयं को समझना। सुकरात  का कथन है, "स्वयं को जानो"। प्रत्येक बालक में दैवीय गुण होते हैं। इन दैवीय गुणों का विकसित कर वह आदर्श स्थिति को प्राप्त कर सकता है। इन गुणों को जानना ही आत्मज्ञान है। जेन्टाईल के अनुसार "आत्मानुभूति ही शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य है और शिक्षा का उद्देश्य है।"


(२) व्यक्तित्व का विकास - आदर्शवादियों का मानना है कि मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है। इसलिए मनुष्य की प्रगति ही शिक्षा का उद्देश्य है। प्लेटो "शिक्षा का उद्देश्य आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण तथा विकास करना है।"

"शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होना चाहिए, जिससे मनुष्य अपनी क्षमताओं के अनुसार मानव जीवन को कुछ मौलिक योगदान दे सके।" - टी.पी. नन।

"आदर्शवाद से विशेष रूप से सम्बन्धित शिक्षा का उद्देश्य है-व्यक्तित्व का उत्कर्ष।" - रॉस ।


(३) आध्यात्मिक मूल्यों की अनुभूति और विकास - आदर्शवादियों ने आध्यात्मिक उन्नति करने को मानव जीवन का लक्ष्य  बताया है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए उन चिरस्थायी मूल्यों जैसे, सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की प्राप्ति को आवश्यक समझा है। इसलिए शिक्षा इस तरह से दी जाए कि प्रत्येक बालक इन मूल्यों की अनुभूति कर सके। रस्क के अनुसार "शिक्षा को मनुष्य को उसकी संस्कृति के द्वारा अधिक और पूर्ण रूप से आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रविष्ट होने योग्य बनाना चाहिए।" 


(४) सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण एवं विकास - मनुष्य बुद्धिजीवी होता है। उसने रचनात्मकता द्वारा सांस्कृतिक ढाँचें को तैयार किया है। मनुष्य की संस्कृति उसकी पैतृक धरोहर है तथा उसका संरक्षण व विकास करना तथा उसको नई पीढ़ी तक पहुंचाना उसका  परम् कर्तव्य है। ये कार्य शिक्षा की सहायता से ही हो सकता है। 

रॉस के अनुसार, "धर्म, नैतिकता, कला, साहित्य, गणित, विज्ञान, विभिन्न गुणों में किये जाने वाले मनुष्य के नैतिक, मानसिक तथा सौन्दर्यात्मक कार्यों का परिणाम है।"


(5) आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति-

शिक्षा का उद्देश्य

आदर्शवादियों के अनुसार सत्यम्, सुन्दरम् एवं शिवम् आध्यात्मिक मूल्य हैं। ये मूल्य चिरस्थायी हैं, शाश्वत हैं, सत्य हैं। इसको मनुष्य ने नहीं बनाया है बल्कि ये पूर्व निर्धारित हैं। मनुष्य को ये मूल्य धरोहर के रूप में मिले हैं। शिक्षा का उद्देश्य बालक को इन आध्यात्मिक मूल्यों की अनुभूति करा कर आध्यात्मिक विकास करना है। इस बारे में हॉर्न का कहना है, "आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति होने पर मनुष्य पूर्णता को प्राप्त करता है। अतः बालक की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो इन आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति में सहायक हो।"


(६) पावन जीवन की प्राप्ति - आदर्शवादी भौतिक सुखों को मिथ्या मानते हैं। वे आत्मा के विकास और आध्यात्मिक मूल्यों की अनुभूति पर जोर देते हैं और इसके लिए व्यक्ति के जीवन का पावन होना अति आवश्यक मानते हैं। उनका मत है कि शिक्षा के द्वारा बालक में अच्छे व बुरे में, उचित व अनुचित में, वांछनीय व अवांछनीय में अन्तर कर पाने की क्षमता विकसित    की  जानी   चाहिए तभी   वह आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर सकेगा। 

इसलिए आदर्शवादियों के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य पावन जीवन की प्राप्ति होना चाहिए। फ्रोबेल के अनुसार "भक्तिपूर्ण, पवित्र तथा कलंक रहित जीवन की प्राप्ति। शिक्षा को मनुष्य का पथ-प्रदर्शन इस प्रकार करना चाहिए कि उसे अपने आप का, प्रकृति का सामना करने का और ईश्वर से एकता स्थापित करने को स्पष्ट ज्ञान हो।" 


(७) सार्वभौमिक शिक्षा - मानव जाति एक है आदर्शवाद समस्त विश्व को एक परिवार मानता है अतः शिक्षा सार्वभौमिक होनी चाहिए। यह शाश्वत सत्य पर आधारित होनी चाहिए। विश्व को एक चिन्तन प्रक्रिया समझा जाता है। यह विवेक से सम्पन्न एक व्यवस्थित इकाई है। हमें इस विश्व को चलाने के लिए शाश्वत मूल्यों का ज्ञान प्राप्त होना चाहिए।


(८) पूर्ण मनुष्य का विकास - बच्चे का पूर्ण मनुष्य में विकास करना आदर्शवादी शिक्षा का उद्देश्य है जिसमें शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक, संवेगात्मक तथा सांस्कृतिक पक्ष सम्मिलित हैं। 


(९) सादा जीवन तथा ऊँच विचार - आदर्शवादियों के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य सादा जीवन तथा ऊँच विचार होना चाहिए।


(१०) शिक्षा का तात्कालिक तथा अन्तिम उद्देश्य - हार्न  ने दो प्रकार के उद्देश्यों को प्रतिपादित किया है: 

(क) तात्कालिक उद्देश्य - इसके अंतर्गत स्वास्थ्य, बुद्धि, कुशलता, कला, सामाजिक न्याय तथा आचरण विकास को रखा है।


(ख) अन्तिम उद्देश्य -  इसके अंतर्गत दिव्यता के प्रतिबिम्ब में मानवता का विकास को रखा है।


देखेें...


(iii) प्रयोजनवाद में शिक्षा के उद्देश्य


प्रयोजनवादी शिक्षा के किसी पूर्व निर्धारित उद्देश्यों को नहीं मानते। उनके अनुसार शिक्षा के उद्देश्य का निर्धारण बालक के अनुभवों के आधार पर  होना चाहिए।

इनके अनुसार किसी व्यक्ति के भौतिक और सामाजिक वातावरण में बदलाव होता रहता है और इस परिवर्तित वातावरण में बालक नये अनुभवों को प्राप्त करता है तथा नये आदर्शों को स्थापित करता है। ऐसी स्थिति में शिक्षा का कोई स्थायी उद्देश्य नहीं हो सकता। प्रयोजनवादी बालक के लिए ऐसे वातावरण  का निर्माण करना चाहते हैं जिससे बालक स्वयं ही अपने लिए उत्तम मूल्यों की रचना करने में सक्षम हो सके।

इस बारे में रॉस ने कहा है, "प्रयोजनवाद की दृष्टि में शिक्षा का सबसे अधिक सामान्य लक्ष्य नये मूल्यों का सृजन करना ही है। शिक्षक का मुख्य कार्य यह है कि शिष्य को ऐसी स्थिति में पहुंचा दे कि वह अपने लिए मूल्यों का निर्माण कर सकें।"


(१) नये मूल्यों के निर्माण  करने योग्य बनाना -  प्रयोजनवादियों के अनुसार मूल्यों का निर्माण क्रिया व अनुभवों के द्वारा किया जाता है, वे पूर्व निर्धारित नहीं होते हैं। इस संबंध में रॉस ने कहा है- "प्रयोजनवाद के अनुसार शिक्षा का सर्वाधिक सामान्य उद्देश्य नवीन मूल्यों का निर्माण करना है, शिक्षक का प्रमुख कर्तव्य बालक को ऐसे वातावरण में रखना है जिसमें रहते हुए वह स्वयं के लिए मूल्यों का विकास कर सके।" 


(२) बच्चों का सर्वांगीण विकास - शिक्षा के द्वारा बच्चों के व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलू के विकास होना चाहिए, चाहे वह बौद्धिक, शारीरिक, नैतिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक हो। बालक की रुचियों, योग्यताओं, क्षमताओं, प्रवृत्तियों आदि का समुचित विकास किया जाना चाहिए, जिससे वह परिवार में, समाज में, देश में सही समायोजन कर अपना जीवनयापन कर सके।


(३) सामाजिक और वातावरणीय समायोजन - शिक्षा द्वारा बालक को वातावरण और समाज में समायोजन करना ही नहीं सिखाया जाता बल्कि उसमें सुधार करना तथा उन सभी वस्तुओं तथा शक्तियों को नियन्त्रित करना भी सिखाया जाता है  जो उनके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है।

प्रयोजनवाद के अनुसार, "शिक्षा मानसिक रूप से विकसित, स्वतन्त्र, जागरूक, मानव की अपने जैवकीय व सामाजिक, वातावरण में समुचित समायोजन की प्रक्रिया है।" 


(४)मूल्यवान वर्तमान जीवन - प्रयोजनवादी भूतकाल में विश्वास नहीं रखते। उनका यह मानना है कि अतीत से ज्यादा महत्त्वपूर्ण वर्तमान है। शिक्षा के द्वारा वर्तमान जीवन को मूल्यवान बनाना ही शिक्षा का उद्देश्य है।


(५) सामाजिक कुशलता का विकास - प्रयोजनवादी जॉन डीवी  के अनुसार, यदि शिक्षा का कोई उद्देश्य है तो केवल बच्चे में सामाजिक कुशलता का विकास करना ही है। सामाजिक कुशलता का अभिप्राय है- बच्चों में अच्छे सामाजिक गुणों का विकास, जिससे वह समाज के अच्छे वातावरण में अपने आपको समायोजित कर सकें। दूसरे शब्दों में सामाजिक कुशलता के मुख्यतः दो बिन्दु हैं :


(1) बच्चों में व्यावसायिक कुशलता का विकास करना जिससे वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके।

 

(2) सामाजिक कुशलता के अन्तर्गत बच्चों में सात्विक गुणों व लोकतान्त्रिक मूल्यों का विकास हो सके, यही शिक्षा का उद्देश्य है। 


(iv) अस्तित्ववाद में शिक्षा के उद्देश्य 


अस्तित्ववादी शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हो सकते हैं-


(१). स्वतन्त्र मनुष्य बनाना - अस्तित्ववाद में शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को पराश्रित न बनाकर स्वतन्त्र बनाना है। इसका मानना है कि सभी व्यक्ति एक ही रास्ते पर चलकर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते। प्रत्येक व्यक्ति अपना लक्ष्य निर्धारित करने तथा उसके प्राप्ति मार्ग का चुनाव करने के लिए स्वतन्त्र है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में इसी योग्यता का विकास करना है। 


(२). भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक विकास - अस्तित्ववाद के अनुसार मनुष्य चयन का कार्य अच्छी प्रकार से तभी कर सकता है जब वह इसमें पूरी तरह मग्न होगा। इसके लिए उसका भावात्मक एवम् सौन्दर्यपरक विकास होना जरूरी है। अतः शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व के इन्हीं दोनों पक्षों का विकास करना होना चाहिए।


(३). जिम्मेदार बनाना - अस्तित्ववाद के अनुसार मनुष्य में जिम्मेदारी का बोध का होना जरूरी है। कोई कार्य सही भी हो सकता है और गलत भी। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य इसके लिए स्वयं जिम्मेदार है। अतः शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में इस दायित्व बोध का विकास करना होना चाहिए।


(४). अद्वितीय व्यक्तित्व का विकास - अस्तित्ववादी मानते है कि मनुष्य एक चेतन प्राणी होने के साथ-साथ अद्वितीय रूप से आत्म चेतना से युक्त है। इस आत्म-चेतना को जागृत उसके अद्वितीय व्यक्तित्व का विकास करना ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।


(५). अस्तित्व बोध का विकास - इनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को इस लायक बनाना है कि वह मनुष्य होने के आशय को समझ सके क्योंकि सारतत्व को समझने के लिए मनुष्य के अस्तित्व में होने का अर्थ समझना जरूरी है।


औपचारिक शिक्षा


(2) भारतीय चिंतन

 

(i) शिक्षा का उद्देश्य के संबंध में गांधी जी के विचार


गांधी जी ने जीवन के विभिन्न पक्षों और आदर्शों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के अनेक उद्देश्य बताए हैं। ये दो भागों में विभक्त किए जा सकते हैं -


(a) सर्वोच्च उद्देश्य 

(b) तात्कालिक उद्देश्य 


(a) शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य - गांधी जी के अनुसार जीवन में शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य है-“अन्तिम वास्तविकता का अनुभव, ईश्वर और आत्मानुभूति का ज्ञान। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे व्यक्ति अन्तिम वास्तविकता को पहचान सके और अपने मरणशील शरीर को ईश्वर में विलीन कर सके। 


(b) शिक्षा के तात्कालिक उद्देश्य - गांधी जी ने शिक्षा के निम्नलिखित तात्कालिक उद्देश्य बताए हैं:


(१) व्यावसायिक का उद्देश्य -

शिक्षा का उद्देश्य

गांधी जी के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को व्यवसाय के योग्य बनाना है, जिससे वह जीवकोपार्जन कर  आत्मनिर्भर हो सके गांधी जी का मत था कि जो शिक्षा हमारी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकती, वह व्यर्थ है उनकी इच्छा थी कि बालक-बालिकाएं जब शिक्षा पूरी कर लें तो उनके सामने रोजी-रोटी की समस्या न आए। गांधी जी ने लिखा है- "शिक्षा को बालकों की बेरोजगारी के विरुद्ध एक प्रकार की सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। सात वर्ष का पाठ्यक्रम समाप्त करने के बाद चौदह वर्ष की आयु में बालक को कमाने वाले व्यक्ति के रूप में विद्यालय के बाहर भेजना चाहिए।"


(२) व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास - गांधी जी के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक  की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक व आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करके उसके व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास करना है। इनके शब्दों में, "शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा का उचित और सामंजस्यपूर्ण विकास करना शिक्षा का उद्देश्य है। शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा का उचित और सामंजस्यपूर्ण सम्मिश्रण सम्पूर्ण व्यक्तित्व की रचना करता है और यही शिक्षा की सच्ची मित्तव्ययिता का निर्माण करता है।" इस प्रकार गांधी जी ने शरीर, मस्तिष्क और आत्मा तीनों के सामंजस्यपूर्ण विकास पर बल दिया है।


(३) सांस्कृतिक उद्देश्य - गांधी जी के अनुसार शिक्षा के द्वारा बालक को अपने व्यवहार में अपनी संस्कृति को व्यक्त करने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इन्होंने कहा है- "संस्कृति नींव है, प्रारम्भिक वस्तु है, तुम्हारे व्यवहार से इसे प्रकट होना चाहिए।" इस प्रकार इन्होंने सांस्कृतिक विकास को शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य माना है। 


(४) नैतिक उद्देश्य - गांधी जी की शिक्षा में नैतिकता या चरित्र निर्माण पर अधिक बल दिया है। इन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है- "मैंने हृदय की संस्कृति अथवा चरित्र निर्माण को सदैव प्रथम स्थान दिया है तथा चरित्र निर्माण को शिक्षा का उचित आधार माना है।"

इनके अनुसार शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण है।

 

(५) मुक्ति का उद्देश्य - गांधी जी के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य है व्यक्ति को मुक्ति दिलाना। मुक्ति' को इन्होंने दो अर्थों में प्रयुक्त किया है। मुक्ति का एक अर्थ है- वर्तमान जीवन में सभी प्रकार की दासता से मुक्ति। इनका कहना है कि जब तक व्यक्ति बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक किसी भी प्रकार की दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, तब तक वह कोई उन्नति नहीं कर सकता। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को सभी प्रकार की दासता से मुक्त कराना है। इनके अनुसार मुक्ति का दूसरा अर्थ है- व्यक्ति को सांसारिक बन्धनों से मुक्त करना और उसकी आत्मा को उच्चतर जीवन की ओर ले जाना। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को आध्यात्मिक स्वतंत्रता का मार्ग प्रदर्शित करने और उसे लक्ष्य तक पहुंचाने का कार्य करना है।


(६) आंतरिक पूर्णता - गांधी जी के अनुसार सम्पूर्ण भौतिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य में पहले से ही मौजूद हैं, परन्तु इस पर अज्ञानता की एक परत होती है शिक्षा के द्वारा उस परत को हटाया जाना चाहिए। 


(७) धार्मिक विकास - परमात्मा, अनुभूति तथा आत्म-अनुभूति परस्पर पूरक हैं, एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। गांधी जी का यह मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं में निहित धार्मिक बीज की खोज तथा विकास करने योग्य होना चाहिए जिससे वह सत्य या वास्तविकता को प्राप्त कर सके। उन्होंने भावनाओं तथा संवेगों के प्रशिक्षण का समर्थन किया था जिससे सम्पूर्ण जीवन शुद्ध बन सके। 


(८) स्वयं में विश्वास का विकास - प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्तियों पर पूरा विश्वास होना चाहिए। उनमें आत्म समर्पण तथा दूसरों के कल्याण के लिए त्याग की भावना का विकास होना चाहिए। शिक्षा के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति में इन गुणों का विकास किया जाना चाहिए।


(ii) टैगोर के शिक्षा के उद्देश्य 


शिक्षा के संबंध में टैगोर का दृष्टिकोण बड़ा व्यापक था। वह उसके द्वारा मनुष्य को भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक अनुभूति दोनों के योग्य बनाना चाहते थे। उनके शिक्षा के उद्देश्यों से सम्बन्धित विचार निम्नलिखित हैं-


(१) शारीरिक विकास - टैगोर ने 'शिक्षा में हेरफेर' नामक बंगला लेख में छात्रों के कमजोर शरीर पर तथा उनके खराब स्वास्थ्य पर चिन्ता प्रकट की है। वह स्वस्थ शरीर को बहुत महत्त्व देते थे। इस दृष्टि से उन्होंने शारीरिक विकास को शिक्षा के उद्देश्य के रूप में माना। उन्होंने तो ये भी कहा था कि शारीरिक विकास के लिए अध्ययन को भी छोड़ना पड़े तो कोई विशेष बात नहीं है। वह चाहते थे कि बच्चों को प्रकृति के स्वस्थ वातावरण में रखा जाए, उन्हें पेड़ों पर चढ़ने दिया जाए, तालाबों में डुबकियां लगाने दिया जाए, इस तरह के क्रियाओं से उनका शारीरिक विकास होगा।


(२) बौद्धिक विकास - टैगोर व्यक्ति के बौद्धिक विकास पर भी जोर देते थे। बौद्धिक विकास से उनका तात्पर्य कुछ विषयों का ज्ञान मात्र नहीं था, अपितु विभिन्न मानसिक शक्तियों के उस शक्तिशाली संगठन से था जिसके द्वारा मनुष्य विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्राप्त करता है, उसमें उपयोगी तथा अनुपयोगी तथ्यों को अलग-अलग करता है, नए-नए उपयोगी तथ्यों की खोज और निर्माण करता है और अपने भौतिक जीवन को सुखमय बनाने तथा आध्यात्मिक पूर्णता की भी अनुभूति करने में सफल होता है। ये सब शिक्षा के द्वारा ही संभव है।


(३) नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास - टैगोर के अनुसार, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है। उन्होंने नैतिक प्रशिक्षण, आत्म-संकल्प, शक्ति, चरित्र विकास, स्वतन्त्रता तथा आत्म प्रकाश के विकास पर जोर दिया। शिक्षा को चाहिए कि वह मनुष्य को मानसिक शक्ति और आत्मिक शक्ति की ओर ले जाए। नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास से ही मनुष्य अपने सर्वोत्तम गुणों को समझ सकेगा।


(४) संतुलित विकास - टैगोर के अनुसार शिक्षा को व्यक्ति की सभी नियमों- शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक के सन्तुलित विकास को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए यह पूर्ण मानवता की ओर इशारा करता है।


(५) उपयोगितावादी उद्देश्य - टैगोर ने शिक्षा के उपयोगितावादी उद्देश्य की भी अवहेलना नहीं की। उनके अनुसार शिक्षा को हमें रोज-रोज की समस्याओं का समाधान करने के योग्य बनाना चाहिए। यह हमारे आर्थिक जीवन तथा जरूरतों के अनुकूल होनी चाहिए।


(६) वैयक्तिक विकास - टैगोर वैयक्तिकवादी व्यक्ति थे तथा शिक्षा के द्वारा मनुष्य की सारी गुप्त शक्तियों को विकसित करना चाहते थे। वह व्यक्ति का स्वतंत्र विकास चाहते थे। उनके अनुसार अध्यापक का पहला काम बच्चे की वैयक्तिक विशेषताओं तथा समानताओं का पता लगाना है और दूसरा काम उसे इनके विकास में मदद करना है। 


(७) सामाजिक विकास : टैगोर व्यक्ति तथा समाज में भेद नहीं करते थे। वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए समाज को एक अनिवार्य माध्यम मानते थे। उनके विचार में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के साथ आध्यात्मिक सम्बन्ध होता है जिसके कारण वे एक दूसरे की कल्याण कामना से प्रेरित होकर सामाजिक संगठन बनाते हैं। इसलिए आध्यात्मिक अनुभूति के  लिए  मनुष्य का आध्यात्मिक विकास आवश्यक है। इसलिए उन्होंने अपनी शिक्षा योजना में सामूहिक कार्यों और लोगों की सेवा को सबसे ज्यादा महत्त्व दिया था। 


(८) आर्थिक विकास - टैगोर व्यक्ति को आर्थिक कुशलता प्रदान करने के लिए औद्योगिक शिक्षा पर भी जोर देते थे। उन्होंने अपने शान्ति निकेतन में हस्तकौशल, शिल्प कलाओं और कृषि को इसी दृष्टि से स्थान दिया है।


(९) राष्ट्रीयता का विकास - टैगोर राष्ट्र के प्रति असीम प्रेम रखते थे, राष्ट्रीयता को वे विशेष स्थान देते थे। वे  अपनी कविताओं तथा लेखों में देश प्रेम को अभिव्यक्त करते रहते थे, और सभी भारतीयों को  इसकी अनुभूति कराते थे। वे मानते थे कि शिक्षा के माध्यम से ही राष्ट्रीयता का विकास किया जा सकता है।


(१०) अन्तर्राष्ट्रीयता का विकास  -  टैगोर मानवतावादी भी थे। उनका कहना था कि हम सब ईश्वर की उत्पत्ति हैं, इसलिए सब एक समान हैं। हमारी संस्कृति तथा सभ्यता में जो  भिन्नताएं हैं वे सब भौतिक हैं। इनमें जो अंतर है वह हमें एक दूसरे से अलग नहीं करती, बल्कि हमें सांसारिक विविधता का ज्ञान कराती है। इस विविधता में ही एकता है। टैगोर के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य अन्तराष्ट्रीयता का विकास करना और उसका ज्ञान कराना भी है ।


औपचारिक शिक्षा


(iii) स्वामी विवेकानंद के शिक्षा के उद्देश्य 


स्वामी जी के अनुसार मानव जीवन का अन्तिम उद्देश्य आत्म अनुभूति ही है। परन्तु इसके लिए वे इस शरीर एवं उसके लिए आवश्यक भौतिक साधन एवं उपसाधनों की आवश्यकता की पूर्ति पर भी बल देते थे। उनके शैक्षिक विचारों में शिक्षा के जिन उद्देश्यों पर जोर दिया गया है वे निम्नलिखित हैं -


(१) शारीरिक विकास - स्वामी जी भौतिकता की सुरक्षा और आध्यात्मिकता की अनुभूति करने के लिए जरूरी ज्ञान, योग और मुक्ति के लिए शरीर के महत्त्व को स्वीकार करते थे और इसलिए शिक्षा द्वारा मानव के शारीरिक विकास की बात करते थे। उन्होंने कहा था लोगों को शरीर को बलशाली बनाने के रहस्यों का ज्ञान होना चाहिए और यह ज्ञान दूसरों को भी देना चाहिए। वह मानसिक और शारीरिक दोनों का विकास आवश्यक मानते थे। वह खुद भी रोज व्यायाम किया करते थे, वह शक्ति के प्रशंसक थे और किसी भी प्रकार की दुर्बलता/कमजोरी के खिलाफ थे। वह शक्ति को जीवन तथा दुर्बलता को मृत्यु समझते थे। 


(२) बौद्धिक विकास - स्वामी जी यह मानते थे कि मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बुद्धि है। उनके अनुसार बुद्धि से ही ज्ञान तथा ज्ञान से भक्ति तथा योग सम्भव है। उनका विश्वास है कि ज्ञान मनुष्य में निहित है, पूर्णता उसके भीतर है। शिक्षा उस पूर्णता की स्थिरता है, इसलिए शिक्षा का उद्देश्य मन में निहित ज्ञान पर से पर्दा उठाना है या उसकी खोज करना है।


(३) नैतिक विकास - स्वामी जी शारीरिक और मानसिक दुर्बलता को पाप समझते थे, इन दुर्बलताओं से बचाव के लिए वह संयम और नियम पर जोर देते थे। उनका विश्वास था कि जब तक व्यक्ति में धार्मिक चेतना का विकास नहीं हो जाता तब तक उसका शारीरिक एवं नैतिक विकास नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार  शिक्षा जीवन निर्माण, मानव निर्माण और चरित्र निर्माण के लिए होनी चाहिए। उनके अनुसार सच्चे व्यक्ति की उत्पत्ति ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है तथा चरित्र ही किसी व्यक्ति का सच्चा स्वरूप है। इसलिए चरित्र निर्माण तथा आध्यात्मिकता का विकास ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। 


(४) व्यावसायिक उद्देश्य - स्वामी जी गरीबी को एक बड़ा अभिशाप मानते थे। उनका विश्वास था कि गरीबी को व्यावसायिक  शिक्षा से ही समाप्त किया जा सकता है। व्यावसायिक उद्देश्य की शिक्षा के बारे में उनका दृष्टिकोण बहुत विस्तृत था वह ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा द्वारा भारी उद्योगों की शिक्षा में विश्वास करते थे। वह यह दृढ़ विश्वास रखते थे कि वह शिक्षा बेकार है जो वयक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होना नहीं सिखाती। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति धन एकत्रित करने में ही लग जाए और लगा रहे। व्यक्ति को दूसरों का शोषण नहीं करना चाहिए। अपना पेट भरने के लिए  व्यक्ति को दूसरों का खून नहीं चूसना चाहिए। व्यावसायिक कुशलता की प्राप्त करने के लिए उन्होंने कृषि और औद्योगिक प्रशिक्षण का सुझाव दिया है।


(५) पूर्ण प्राप्ति का उद्देश्य - स्वामी विवेकानन्द के अनुसार पूर्णता की स्थिरता भी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। प्रत्येक बच्चे में कुछ छिपी हुई प्रवृत्तियां होती हैं शिक्षा उन शक्तियों को विकसित तथा स्थिरता में सहयोग करती है।


(६) समाज सेवा तथा त्याग उद्देश्य - स्वामी विवेकानंद मनुष्य में ईश्वर का वास मानते हैं और उसकी सेवा को ईश्वर की सेवा मानते हैं। उन्होंने शिक्षा द्वारा अपने इस विश्वास को विस्तारित करने का प्रयत्न किया। इसी प्रकार स्वामी जी का मत है कि शिक्षा को व्यक्ति में त्याग भावना पैदा करनी चाहिए। त्याग भावना के बिना व्यक्ति दूसरों के लिए कार्य नहीं कर सकता। शिक्षा द्वारा मनुष्य में यह भावना भरी जानी चाहिए कि हम सब संसार के कर्जदार हैं, संसार के लिए कुछ करने में ही व्यक्ति का महत्त्व है।


(७) विश्व बन्धुत्व - स्वामी विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा विश्वात्मक भ्रातृत्व को विकसित करने का एक साधन है। शिक्षा को सिखाना चाहिए कि सभी प्राणियों में एक ही आत्मा का वास है। इस प्रकार की भावना को उत्पन्न करने वाली शिक्षा ही उपयोगी शिक्षा है।


(८) आध्यात्मिक विकास - स्वामी जी मनुष्य जीवन का अन्तिम उद्देश्य तो आत्मज्ञान ही मानते हैं और यही उनकी शिक्षा का पहला और अन्तिम उद्देश्य है। शिक्षा द्वारा मनुष्य में यह विकास उत्पन्न होना चाहिए, "उठो, जागो और तब तक न रुको जब तक तुम्हारा उद्देश्य पूरा नहीं होता।" इन्होंने हमेशा लोगों को यही सिखाया है और इसी को वह शिक्षा का मार्गदर्शन बनाना चाहते हैं। आत्मविश्वास और आत्म-निर्भरता शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।


(९) विविधता में एकता की खोज -

शिक्षा का उद्देश्य

स्वामी जी का विश्वास था कि विविधता में एकता की खोज करना शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। उनके अनुसार भौतिक और आध्यात्मिक एकता संसार में मौजूद है, ब्रह्मा भी एक है, उन्होंने भौतिक एवं आध्यात्मिक आदर्शों में समन्वय स्थापित किया है। शिक्षा द्वारा व्यक्ति में विविधता में एकता खोजने की योग्यता विकसित होना चाहिए।


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(3) भारतीय दर्शन विचारधारा


(i) सांख्य दर्शन में शिक्षा के उद्देश्य


सांख्य दर्शन के अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

१.  अज्ञानता से मुक्ति - इस दर्शन के अनुसार अज्ञानता सभी प्रकार के दुःखों का कारण है शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को इस अज्ञानता के अन्धकार से मुक्त करना है, जिससे वह अपने जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की ओर अग्रसर हो सके। 


२. आत्मज्ञान - इस दर्शन अनुसार आत्मज्ञान की प्राप्ति से ही व्यक्ति मोक्ष की ओर बढ़ सकता है। भौतिक सुख स्थायी नहीं है। बाहरी दुनिया से सम्बन्धित होने के कारण ये सुख नश्वर हैं। सुख आन्तरिक है। इसे व्यक्ति आत्मज्ञान से प्राप्त कर सकता है। अतः शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को आत्म ज्ञान  प्राप्ति में सहायता करना है।


३. शारीरिक विकास - हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्त करने का साधन हैं। अतः इनका प्रशिक्षित एवं विकसित होना आवश्यक है। अतः शिक्षा का उद्देश्य इन दोनों को प्रशिक्षित कर व्यक्ति का शारीरिक विकास करना है जिससे वह आत्म ज्ञान की ओर  बढ़ सके।


४. बौद्धिक विकास - सांख्य दर्शन बौद्धिक विकास पर विशेष जोर देता है। इसके अनुसार बुद्धि ही ऐसा तत्त्व है जो उसे उचित अनुचित का निर्णय लेने के योग्य बनाती है, यही व्यक्ति में विवेक को जागृत करती है। उसे शरीर, मन व अहंकार की दासता से मुक्त करती है। अतः शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का बौद्धिक विकास करना है। 


५. मानसिक विकास - यह दर्शन मन को बुद्धि से अलग एक आन्तरिक इंद्रिय मानता है। इसका सम्बन्ध चिन्तन, तर्क, विश्लेषण तथा संश्लेषण जैसी प्रक्रियाओं के साथ है। इसके अनुसार मन का विकास जन्म के बाद धीरे-धीरे होता है और इस कार्य में शिक्षा सहायता कर सकती है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य मानसिक विकास करना भी है।


६. नैतिक विकास - यह दर्शन सद्विवेक इस सद्विवेक का सम्बन्ध हमारी नैतिकता के साथ है। इस विवेक के जागृत होने पर व्यक्ति में अनासक्ति का भाव पैदा हो जाता है। उसमें सात्त्विक गुणों का विकास हो जाता है तथा वह धीरे-धीरे अज्ञान से मुक्त होकर मोक्ष की ओर बढ़ने लगता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य नैतिक विकास भी है। 


(ii) पूर्व मीमांसा दर्शन में शिक्षा के उद्देश्य


१. चरित्र निर्माण, धर्म और नैतिक मूल्यों पर जोर दिया है।


२. प्रमाणित तथ्यों को स्वीकार करने पर जोर देना।


३. मोक्ष प्राप्ति शिक्षा का मूल उद्देश्य होना चाहिए।


४. रूढ़िवादी संस्कारों से विद्यार्थियों को दूर करना।


५. भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होना क्योंकि भौतिक सुख  अन्तहीन है।


(iv) वेदान्त दर्शन में शिक्षा का उद्देश्य


इसके अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं- 

१. गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने के योग्य बनाना - इनकी शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में अच्छे विवेक का विकास करना है जिससे वह ज्ञान व अज्ञान के अन्तर को समझकर अच्छा जीवन बिता सके।


२. विविधता में एकता का बोध कराना - संसार की वस्तुओं व व्यक्तियों में हमें भिन्नता दिखाई देती है लेकिन उनमें अंतर्निहित एकता को हम नहीं समझ पाते। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को यही बोध कराना है प्रत्येक एक ही ब्रह्म का वास है।


३. आंतरिक शक्तियों का बोध कराना - इनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में अपार आंतरिक शक्तियां होती हैं। पर अज्ञान के कारण हम उन्हें पहचान नहीं पाते। अतः शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को अपनी इन अन्तर्निहित शक्तियों का बोध कराना होना चाहिए।


४. चिन्तन शक्ति का विकास करना - इस दर्शन के अनुसार  मनुष्य में विवेकशील होता है। उसकी यही विशेषता उसे अन्य जीवों से अलग करती है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में इस चिन्तन शक्ति का और अधिक विकास करना है।


५. उच्चतर आदर्शों की प्राप्ति - इनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को इस ढंग से प्रशिक्षित करना है कि वह जीवन में और अधिक ऊँचे आदर्शों की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सके।


६. व्यक्तित्व का विकास - शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को इस लायक बनाना है कि वह स्वविवेक से निर्णय ले सके तथा अपने व्यक्तित्व का अच्छा विकास कर सके।


(v) बौद्ध दर्शन में शिक्षा का उद्देश्य


१. अज्ञानता से मुक्ति  - इस दर्शन के अनुसार जीवन दुःखों से भरा है जिसका कारण  व्यक्ति का अज्ञानता है। अज्ञान से मुक्ति व्यक्ति को दुःखों से मुक्त कर सकती है। अतः शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को इस अज्ञानता से मुक्ति दिलाना है।


२. चरित्र निर्माण - यह दर्शन जीवन के नैतिक पक्ष को विशेष महत्त्व देता है। अतः चरित्र निर्माण बौद्ध शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य माना जा सकता है।


३. व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास - यह दर्शन व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, चारित्रिक एवं आध्यात्मिक पक्ष को महत्त्व देता है। अतः यह कहा जा सकता है कि इनकी शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है।

 

४. संस्कृति की सुरक्षा एवं हस्तान्तरण - बौद्ध भिक्षु भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को अपने व्यवहार में लागू करते थे और इसके विषय में दूसरों को भी जानकारी देते थे तथा उन्हें भी इन मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करते थे। इस प्रकार संस्कृति की सुरक्षा एवं हस्तान्तरण इनकी शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था। 


५. आत्मानुशासन - बौद्ध दर्शन ने जिस अष्टांगिक मार्ग का प्रतिपादन किया है उससे व्यक्ति में आत्मानुशासन का विकास होता है। अतः बौद्ध शिक्षा का एक उद्देश्य व्यक्ति को इस अष्टांगिक मार्ग से परिचित कराना एवं इस पर चलने के लिए प्रेरित करता है जिससे उसमें आत्मानुशासन की प्रवृत्ति का विकसित हो सके।


६. निर्वाण प्राप्ति -

शिक्षा का उद्देश्य

इस दर्शन के अनुसार चार आर्य सत्यों की जानकारी से निर्वाण प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य है। इसलिए बौद्ध शिक्षा का अन्तिम उद्देश्य व्यक्ति को इन चार आर्य सत्यों का ज्ञान कराना तथा निर्वाण की ओर अग्रसर करना है, निर्वाण का अर्थ है दुःखों से मुक्ति। इस प्रकार स्पष्ट है कि बौद्ध दर्शन एक और व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास एवं निर्वाण प्राप्ति जैसे वैयक्तिक उद्देश्यों पर बल देते हैं तो दूसरी ओर संस्कृति की सुरक्षा व हस्तान्तरण एवं आत्म-अनुशासन जैसे उद्देश्यों के द्वारा एक स्वस्थ समाज के निर्माण के भी पक्षधर हैं। इस प्रकार इनकी शिक्षा वैयक्तिक एवं सामाजिक दोनों प्रकार के शैक्षिक उद्देश्यों को महत्त्व देती है।


(vi) जैन दर्शन में शिक्षा का उद्देश्य

 

इनके अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-


१. सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति - सम्यक् ज्ञान त्रिरत्नों में से एक है और यह इस दर्शन के अनुसार शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य भी है। सम्यक् का अर्थ है अच्छा या उचित। इस प्रकार सम्यक् ज्ञान वह है जो व्यक्ति को अज्ञानता से मुक्ति दिलाए। अतः शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को काम, क्रोध, लोभ तथा मोह आदि प्रवृत्तियों से मुक्त कर उसे मोक्ष की ओर अग्रसर करना है।


२. सम्यक् दर्शन का विकास - यह भी इस दर्शन का एक त्रिरत्न है और शिक्षा का उद्देश्य भी। सम्यक् दर्शन को निम्नलिखित अर्थों में प्रयुक्त किया गया है: (i) गुरु के प्रति श्रद्धा रखना (ii) भावात्मक पक्ष का विकास करना।

सम्यक् ज्ञान व्यक्ति के बौद्धिक पक्ष के साथ सम्बन्ध रखता है, और सम्यक् दर्शन का सम्बन्ध उसके भावात्मक पक्ष के साथ है।

 

३. सम्यक् चरित्र का विकास - यह जैन दर्शन का तीसरा त्रिरत्न है। यह भी जैन दर्शन का एक मुख्य उद्देश्य है। इसका विकास व्यक्ति के सम्यक ज्ञान व सम्यक दर्शन के लक्ष्य प्राप्ति के बाद होता है। जैन दर्शन के अनुसार सम्यक चरित्र का अर्थ है:

(i) व्यक्ति को अहितकर कार्यों से हटाना तथा 

(ii) हितकारी कार्यों की ओर प्रवृत्त करना।


४. कठोर अनुशासन के लिए तैयार करना - जैन दर्शन द्वारा प्रतिपादित  पाँच महाव्रत जैसे नियम बहुत कठिन हैं। इनका पालन किए बिना जीवन का लक्ष्य प्राप्त करना सम्भव नहीं है। अतः जैन शिक्षा का एक उद्देश्य व्यक्ति को कठोर अनुशासन के लिए तैयार करना भी है। 


५. सर्वधर्म समभाव - इनके बहुत्ववादी सिद्धान्त से यह परिलक्षित होता है कि जैन धर्म सर्वधर्म समभाव में विश्वास करता है। अतः शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में सभी धर्मों के प्रति समानता की भावना का विकास करना है।


उपरोक्त चिन्तनों में वर्णित शिक्षा के उद्देश्यों को अगर वर्गीकरण किया जाए तो मुख्य रूप से शिक्षा के छह उद्देश्य होंगे-

●विशिष्ट उद्देश्य ●व्यक्तिगत उद्देश्य ●सार्वभौमिक उद्देश्य ●आध्यात्मिक एवं नैतिक उद्देश्य ●आर्थिक उद्देश्य ●सामाजिक उद्देश्य।


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